*ग़ज़ल*
🌴 *ग़ज़ल*🌴
मुड़कर कभी देखा नहीं
कि कट गया कितना सफ़र
याद भी ये न रहा
कि पी गया कितना ज़हर।
जब भी चाहा थामना मैं
जिंदगी को बांहों में,
ज़ख्म नया दामन में उभरा
छोड़ गया अपना असर।
पांव के छाले हैं या
तहरीर-ए-जिंदगी है ये
रहगुज़र बस जानता
दर्द है कितना उधर।
अपनी जन्नत को जहन्नुम
क्यों बनाने की है जि़द,
बंदों पर अपने खु़दा
बरपा न तू इतना कहर।
सियासी मरहम नहीं
नासूर ये भर पायेगा,
हो गई सबको ख़बर
निजा़म तेरा कितना लचर।
सैकडो़ं दरिया का मीठापन भी
काम आया नहीं,
कुछ बदलते ही नहीं
खारा तभी इतना बहर।
गठरियों में जाँ बचाकर
लौटे *तारक* गाँव जो
कहते हैं रो-रोके बाबा,
संगदिल कितना शहर।
🌹 *तारक नाथ चौधुरी*🌹
से.नि.व्याख्याता
चरोदा(दुर्ग)
🌹
Marvellous
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